उत्तराखंड UCC विवाद: ‘लिव-इन’ रजिस्ट्रेशन के खिलाफ नैनीताल हाई कोर्ट में पहली PIL दाखिल, सरकार से जवाब तलब

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नैनीताल: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) के तहत ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) के अनिवार्य पंजीकरण का मुद्दा अब सियासी गलियारों से निकलकर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। राज्य सरकार द्वारा रजिस्ट्रेशन पोर्टल की टेस्टिंग शुरू किए जाने के बीच, आज नैनीताल हाई कोर्ट (Nainital High Court) में इस फैसले के खिलाफ पहली जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर दी गई है।

एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन (NGO) और कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर इस याचिका ने धामी सरकार के इस बहुचर्चित कानून के सामने पहली बड़ी कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है।

‘निजता के अधिकार’ का खुला उल्लंघन: याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष तर्क दिया है कि दो वयस्कों का लिव-इन में रहना उनका निजी फैसला है। सरकार द्वारा इसे अनिवार्य रूप से पंजीकृत कराना और ऐसा न करने पर सजा या जुर्माने का प्रावधान करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy) का सीधा उल्लंघन है।

याचिका में मुख्य रूप से दो मांगें की गई हैं:

  1. पोर्टल पर रोक: सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे लिव-इन रजिस्ट्रेशन वेब पोर्टल की लॉन्चिंग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
  2. कानून की समीक्षा: UCC के उस विशेष खंड की संवैधानिक वैधता की समीक्षा की जाए, जो लिव-इन संबंधों को पुलिस या रजिस्ट्रार के दायरे में लाता है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इससे कपल्स को ‘मोरल पुलिसिंग’ (Moral Policing) और सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ सकता है।
First PIL filled against UCC Live-in Relationship Registration
First PIL filled against UCC Live-in Relationship Registration (AI Image)

हाई कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया, सरकार से मांगा जवाब

नैनीताल हाई कोर्ट ने इस जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। अदालत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। अब सभी की निगाहें सरकार के उस जवाब पर टिकी हैं, जिसमें उसे यह साबित करना होगा कि यह कानून निजता के अधिकार का हनन नहीं, बल्कि सुरक्षा का उपाय है।

क्या है सरकार का पक्ष?

गौरतलब है कि राज्य सरकार शुरुआत से ही यह तर्क देती आई है कि लिव-इन संबंधों का पंजीकरण महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने, धोखाधड़ी रोकने और रिश्तों में कानूनी जवाबदेही तय करने के लिए आवश्यक है। सरकार का यह पोर्टल मार्च के पहले सप्ताह में आम जनता के लिए लाइव होने की उम्मीद थी, लेकिन अब हाई कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा कि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है या नहीं।

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